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ट्रिशुली, नेपाल – 4 सितंबर 2026, 08:15 पश्चिमी समय

बाढ़ के बाद से ट्रिशुली के एक ही कमरे में लगभग 20 सदस्यीय परिवार रह रहा है। बाढ़ ने घरों को नष्ट कर दिया, सड़कें कट गईं और कई परिवारों को बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं मिलीं। एक सप्ताह के भीतर, भारतीय स्वयंसेवक 10 घंटे तक ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी सड़कों और टूटे हुए पुलों को पार करते हुए भोजन, बिस्तर और घरेलू आवश्यकताएँ पहुँचाने के लिए यात्रा कर रहे हैं। कुछ क्षेत्रों में, जैसे रासुवा, पहुँच केवल हेलीकॉप्टर से ही संभव है।

बाढ़ के बाद की स्थिति

ट्रिशुली, टुपचे और अन्य दूरस्थ समुदायों में स्वयंसेवकों ने पाया कि कई परिवार एक ही कमरे में रह रहे हैं, जहाँ शेल्टर और बुनियादी घरेलू उपकरणों की कमी है। कुछ परिवारों ने सब कुछ खो दिया है। बाढ़ के कारण सड़कों और पुलों का नष्ट होना, साथ ही बिजली और इंटरनेट की कमी, राहत कार्यों को और भी कठिन बना रही है।

भारतीय स्वयंसेवक की चुनौतियाँ

काठमांडू से ट्रिशुली तक की यात्रा 9 से 10 घंटे तक चलती है, क्योंकि रास्ते में क्षतिग्रस्त या पूरी तरह से बहा हुआ सड़कें हैं। स्वयंसेवक ट्रक में सामान लेकर जाते हैं, जबकि 4x4 वाहनों की मांग बढ़ गई है, जिससे उन्हें ढूंढना मुश्किल हो गया है और कीमतें बढ़ गई हैं। रासुवा के कुछ प्रभावित क्षेत्रों में सड़क कनेक्टिविटी नहीं है, इसलिए हेलीकॉप्टर ही एकमात्र विकल्प है। एक हेलीकॉप्टर यात्रा की लागत लगभग $2,000 है, जिससे राहत पहुँचाने का खर्च बढ़ जाता है।

रिलैफ प्रयास का नया फोकस

रिलैफ प्रयास अब पहुँच योग्य बाढ़‑प्रभावित क्षेत्रों से अलग-थलग बसे हुए समुदायों की ओर बढ़ रहा है। इन परिवारों ने घर, पशुपालन, सामान और आजीविका खो दी है, लेकिन भौगोलिक और बुनियादी ढांचे की क्षति के कारण उन्हें पहुँच पाना मुश्किल है।

“एक हफ्ते के बाद, कुछ अधिक पहुँच योग्य क्षेत्रों में राहत धीरे‑धीरे पहुँच रही है, लेकिन हमारा सबसे बड़ा चिंता अब उन परिवारों तक पहुँचने की है जो सबसे अधिक प्रभावित हैं और अलग‑थलग हैं,”

— मनोहर नायडू, खालसा एड से स्वयंसेवक, द हिंदू से रिपोर्ट

मृत्यु और शोक

स्वयंसेवकों ने बताया कि शव दफन के लिए बड़े पैमाने पर कार्य चल रहे हैं, क्योंकि दफन गृहों में जगह खत्म हो रही है। मृतकों को समायोजित करने के लिए वन भूमि को साफ किया जा रहा है, जबकि कई शवों की पहचान अभी भी नहीं हो पाई है।

लॉजिस्टिक बाधाएँ

संगठन स्थानीय स्तर पर आपूर्ति खरीद रहा है, लेकिन गद्दे, सोलर लाइट्स और अन्य घरेलू वस्तुओं की मांग उपलब्धता से अधिक है।

“हमारा तत्काल समर्थन भोजन, कपड़े, बिस्तर और बुनियादी घरेलू आवश्यकताओं पर केंद्रित है। साथ ही, हम प्रत्येक समुदाय की दीर्घकालिक पुनर्प्राप्ति के लिए आवश्यकताओं का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं,”

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— मनोहर नायडू

भविष्य की योजनाएँ

अगला चरण शेल्टर, साफ पानी, स्वच्छता और बच्चों को शिक्षा में वापस लाने पर केंद्रित होगा। इसके बाद आजीविका को पुनः स्थापित करना, घर, सड़कें, पुल और सामुदायिक बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण करना शामिल है।

संगठन ने पहले ही अलग-थलग गांवों को दीर्घकालिक समर्थन के लिए अपनाने का प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्ताव क्षति की सीमा, प्रभावित परिवारों, आजीविका के नुकसान और बुनियादी ढांचे की जरूरतों के आधार पर मूल्यांकन किया जा रहा है, ताकि संसाधनों को अत्यधिक प्रभावित समुदायों पर केंद्रित किया जा सके।

संगठन की प्रतिक्रिया

खालसा एड ने अस्थायी होल्डिंग सेंटर स्थापित करने पर भी विचार किया है, जिनमें गद्दे, पोर्टेबल शौचालय और खाना पकाने की व्यवस्था होगी, ताकि बिना बुनियादी सुविधाओं के साथ रहने वाले परिवारों को अस्थायी राहत मिल सके।

संगठन ने स्थानीय क्षेत्रों में मलबा साफ करने के लिए आधिकारिक अनुमति भी मांगी है, ताकि कनेक्टिविटी बहाल हो सके और प्रभावित समुदायों तक पहुँच आसान हो सके।

सार्वजनिक और सरकारी सहयोग

दस भारतीय स्वयंसेवक वर्तमान में लॉजिस्टिक्स, आकलन, पैकिंग और वितरण में लगे हुए हैं। कई के पास पिछले आपदाओं, जैसे कि असम बाढ़, में अनुभव है, लेकिन नेपाल की पहाड़ी भू-भाग, लंबी यात्राएँ और सीमित बिजली व इंटरनेट कनेक्टिविटी ने अतिरिक्त चुनौतियाँ पैदा की हैं।

“सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि राहत सामग्री उपलब्ध हो, बल्कि यह है कि उसे उन परिवारों तक पहुँचाया जाए जिन्हें सबसे ज़रूरत है,” मनोहर नायडू ने कहा।

“लोगों को सिर्फ भोजन से अधिक की जरूरत है। वे पूछ रहे हैं कि वे अपनी ज़िंदगी कैसे फिर से बनायेंगे,” उन्होंने जोड़ा।

रिलैफ प्रयास अब तक के अनुभव से सीखते हुए, खालसा एड और अन्य स्वयंसेवक बाढ़‑प्रभावित क्षेत्रों में राहत पहुँचाने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। उनकी प्राथमिकता उन परिवारों तक पहुँचने की है जो अभी भी अलग-थलग हैं और जिनकी ज़रूरतें सबसे अधिक हैं।