
डेल्ही में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन: ट्रम्प की नीतियों पर छाया, भारत की वैश्विक दक्षिण में नेतृत्व की कोशिश
इस सप्ताहांत डेल्ही में ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के दौरान 11 देशों के नेता – भारत, चीन, रूस, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, सऊदी अरब (आमंत्रित सदस्य), इराक, इराक, और अन्य – मिले। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, जो ब्रिक्स के सदस्य नहीं हैं, की नीतियों का इस बैठक पर गहरा प्रभाव है।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का पृष्ठभूमि
ब्रिक्स समूह, जिसे 2024 में सऊदी अरब के आमंत्रण से विस्तारित किया गया, वैश्विक अर्थव्यवस्था में 49% आबादी, 40% जीडीपी और 26% अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रतिनिधित्व करता है। इस शिखर सम्मेलन में प्रमुख मुद्दों पर चर्चा होगी, परंतु सबसे महत्वपूर्ण विषय ट्रम्प की नीतियों का प्रभाव है।
ट्रम्प की नीतियों का प्रभाव
ट्रम्प प्रशासन ने 2024 के नवंबर में चेतावनी दी कि यदि ब्रिक्स देशों ने अमेरिकी डॉलर के विकल्प के रूप में कोई नई मुद्रा अपनाई तो उन पर “100% टैरिफ” लगाया जाएगा। इस प्रकार की नीति ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को अस्थिर किया है और विश्व अर्थव्यवस्था को अनिश्चितता में डाल दिया है।
इसके अलावा, ट्रम्प ने ब्रिक्स के प्रयासों को “डॉलर-डिसेंट्रलाइज़ेशन” के रूप में आलोचना की है, जिससे समूह के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के प्रयासों को खतरा है।
ब्रिक्स के भीतर विभाजन
ब्रिक्स के भीतर गहरी विभाजन हैं। माइक केगेलमैन, अटलांटिक काउंसिल के वरिष्ठ फेलो, ने बीबीसी को बताया कि “भारत को वाशिंगटन के खिलाफ खुली आलोचना वाली संयुक्त घोषणा नहीं करनी चाहिए।” वे मानते हैं कि किसी भी आलोचना को “अस्पष्ट और अप्रत्यक्ष” होना पड़ेगा।
रूस और ईरान समूह को ट्रम्प के खिलाफ स्पष्ट रुख अपनाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, परंतु भू-राजनीतिक वास्तविकताएँ इसे कठिन बना देती हैं। भारत, जो अमेरिकी व्यापार समझौते के अंतिम चरण में है, वाशिंगटन को नाराज़ नहीं करना चाहता। चीन भी ब्रिक्स को वाशिंगटन पर निशाना बनाने के रूप में नहीं देखना चाहता।
संयुक्त अरब अमीरात, जो अमेरिकी सैन्य आधारों का घर है, ईरान के खिलाफ अमेरिकी और इज़राइल के हमलों के जवाब में ईरान पर हमला कर रहा है, इसलिए वह भी ऐसी घोषणा का समर्थन नहीं करेगा जो ईरान के पक्ष में हो।
भारत की रणनीति और चुनौतियाँ
भारत के लिए यह शिखर सम्मेलन वैश्विक दक्षिण में अपनी नेतृत्व की भूमिका को मजबूत करने का अवसर है। डेल्ही के विदेशी नीति के प्राथमिकताएँ – बहुपक्षवाद, बहु-ध्रुवीय विश्व, विकासशील देशों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व और मुक्त वैश्विक व्यापार – ब्रिक्स के व्यापक एजेंडा के साथ मेल खाती हैं।
हालाँकि, भारत को चीन के प्रभाव को संतुलित करना होगा, जो विकासशील दुनिया में अधिक प्रभावशाली है। माइक केगेलमैन ने कहा, “भारत के प्रयासों को अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में सीमित सफलता मिली है, जहाँ चीन अधिक सफल रहा है।”
ब्रिक्स के विस्तारित सदस्यता ने भारत को इथियोपिया, ब्राज़ील और इंडोनेशिया जैसे देशों के साथ गहरे संबंध बनाने का मौका दिया है।

द्विपक्षीय बैठकें और प्रमुख मुद्दे
शिखर सम्मेलन के दौरान कई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठकें होंगी। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शनिवार को डेल्ही में मिलना विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करेगा। दोनों देशों के बीच संबंध धीरे-धीरे पुनर्निर्माण हो रहे हैं, पर प्रगति अपेक्षा से अधिक सतर्क रही है।
मॉस्को के साथ भी बैठकें होंगी, जहाँ यूक्रेन युद्ध प्रमुख विषय होगा। मोदी ने पिछले महीने शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन में पिस्केक में पुतिन से मुलाकात के दौरान शांति की अपील की थी।
इसके अलावा, भारत का रूस और चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा भी चर्चा का विषय होगा।
संकल्पना और भविष्य की दिशा
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का एक प्रमुख लक्ष्य एक संयुक्त घोषणा तैयार करना है, जो समूह की उपलब्धियों को उजागर करे। पिछले मई में, ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों ने ईरान युद्ध पर मतभेदों के कारण संयुक्त घोषणा पर सहमति नहीं बनाई, जिससे भारत को केवल अध्यक्ष का सारांश जारी करना पड़ा।
भारत ने 2023 में G20 के मेजबान के रूप में गहरी विभाजनों के बावजूद एक संयुक्त घोषणा सुरक्षित की थी। इस अनुभव से भारत को विश्वास है कि वह इस शिखर सम्मेलन में भी एक सुसंगत बयान तैयार कर सकता है।
हालाँकि, अमेरिकी ट्रम्प की नीतियों पर किसी भी स्पष्ट आलोचना को सावधानीपूर्वक तैयार किया जाएगा ताकि टकराव से बचा जा सके। ब्रिक्स के भीतर वित्तीय सहयोग को मजबूत करने के लिए स्थानीय मुद्राओं में क्रॉस-बॉर्डर भुगतान को आसान बनाने के प्रस्ताव भी चर्चा में होंगे, जो रूस और ईरान के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
ब्रिक्स ने पहले ही न्यू डेवलपमेंट बैंक के माध्यम से बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए अरबों डॉलर की स्वीकृति दी है और $100 बिलियन की आकस्मिक रिज़र्व व्यवस्था बनाई है, हालांकि इसे अभी तक परखा नहीं गया है।
इस शिखर सम्मेलन के दौरान, ब्रिक्स वैश्विक दक्षिण की आवाज़ के रूप में अपनी भूमिका को आगे बढ़ाने के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसे संस्थानों में सुधार के लिए भी प्रयास करेगा।
वर्तमान स्थिति
शिखर सम्मेलन अभी भी चल रहा है और कोई औपचारिक संयुक्त घोषणा अभी तक नहीं हुई है। अमेरिकी अधिकारियों ने इस बैठक पर करीबी नजर रखी है, जबकि भारत और अन्य ब्रिक्स सदस्य अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।
इस शिखर सम्मेलन के परिणामस्वरूप, ब्रिक्स की वैश्विक प्रभावशीलता और भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर गहरा असर पड़ेगा।